Thursday, April 23, 2015

कौन रोकेगा किसान की आत्महत्याएं?


अब्दुल सत्तार सिलावट

''किसान की फसलों के अलावा देश में अन्य व्यापार, उद्योगों में भी आपदाएं, मंदी, अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मार से, शेयर मार्केट के लुढ़कने से करोड़ों रूपये डूब जाते हैं। कपास या सूत के निर्यात बंद होने पर पाँच पाँच रूपया मीटर भाव टूटने से मिल मालिकों को करोड़ों का नुकसान हो जाता है। सट्टा बाजार के ऑनलाइन व्यापार में भी करोड़ों के घाटे आपने सुने होंगे, लेकिन कभी किसी मिल मालिक, शेयर बाजार के दलाल, एक्सपोर्टर को आत्महत्या करते नहीं सुना होगा, जबकि देश के बड़े उद्योगपतियों के पास राष्ट्रीय बैंकों के हजारों करोड़ के लोन डूबत खाते में न्यायालयों के मुकदमों में फंसे पड़े हैं, लेकिन गाँव का किसान दस-बीस हजार के कॉपरेटीव लोन या साहूकार की उधारी नहीं चुकाने पर समाज-परिवार को मुँह दिखाने लायक नहीं रहता है और आत्महत्या कर देता है। अब आप ही बताएं कौन खुद्दार है किसान या बैंकों का हजारों करोड़ लेकर बैठा उद्योगपति। समाज और सरकार किसान की खुद्दारी बचाने के लिए 100-100 रूपये के चैक देने बंद कर उसका वास्तविक नुकसान भुगतान करे। सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते की तरह किसान के लिए भी एक सम्मानजनक मासिक आय निर्धारित कर उसकी फसल का उचित मूल्य तय करे। तभी किसानों की आत्महत्याएं बंद होंगी अन्यथा किसान की मौत पर सरकारें भले ही शर्मिंदा ना हों, लेकिन भगवान जरूर शर्मसार हो जायेगा।''

भारत कृषि प्रधान देश है और आज देश के कौने-कौने में किसान आत्महत्याएं कर रहा है। हमारे प्रधानमंत्री फ्रांस, जर्मनी, कनाडा की विदेश यात्राओं के बाद राज्यों के मुख्य सचिवों से वीडियो कांफ्रेंसिंग कर प्रगति पूछ रहे हैं। संसद में भूमि अधिग्रहण बिल पर किसान के शोषण पर विपक्ष से शक्ति परीक्षण चल रहा है। हमारे राजस्थान में भी आठ माह बाद होने वाले रिसर्जेंट राजस्थान की तैयारी में मुख्यमंत्री के साथ मुख्य सचिव और प्रदेश को चलाने वाले मुख्य ब्यूरोक्रेट्स जापान से कलकत्ता तक नया निवेश लाने में व्यस्त हैं। उद्योगों के विकास के प्रयास प्रसंसनीय हैं, लेकिन प्रदेश का किसान ओलावृष्टी और बेमौसम की बरसात से बर्बाद होने के बाद विधानसभा से गाँव की चौपाल तक सरकारी सहायता की घोषणाओं की उम्मीद पर अपने घर खर्च से बेफिक्र होकर अपने खेतों में मवेशियों के लिए बची हुई घास निकालने में लगा था, लेकिन सरकारी मदद के नाम पर हजारों के नहीं 100-200 रूपये के चैक देखकर उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया और इसी सरकारी मदद के बाद किसान आत्महत्याएं कर रहा है या हार्ट अटैक से मर रहा है, हमारे किसी राजनेता को इसकी चिन्ता नहीं है!
राजस्थान के दौसा के किसान की दिल्ली में 'आप' के सम्मेलन में पेड़ से लटककर आत्महत्या की खबर राजस्थान में सत्ता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के 'आवभगत' की तैयारियों में दबकर रह गई। भाजपा को अगले चार साल तक वोटों की जरूरत नहीं है इसलिए ग्रामीण, मजदूर, गरीब, किसान की चिन्ता से मुक्त नेता स्थाई साथी उद्योगपति, बिल्डर्स, ज्वैलर्स, एक्सपोर्टर्स के साथ 'गलबहियों' में उलझे हुए हैं। कुछ नेता अन्य प्रदेशों से राज्य में निवेशक लाने के प्रयासों में हवाई सफर कर रहे हैं। किसान के दर्द से सभी बेखबर। नेताओं और अफसरों को ऐसा लगता है कि राजस्थान में ओलावृष्टी से फसलें पिछले साल बर्बाद हुई थीं, जबकि दस दिन पहले तक विधानसभा में कुछ विधायक किसानों की बर्बादी पर राहत की माँग उठा लेते थे और सरकार भी हमदर्दी के आँसूओं के साथ मुफ्त बिजली, ब्याज मुक्त कर्ज जैसी घोषणाएं कर देती थीं, लेकिन अब किसान की बात करने की किसी को फुर्सत नहीं है।
आजादी के बाद से अब तक देश के राजनेताओं को संसद पहुँचाने एवं देश की तरक्की में कृषि करने वाला किसान 'रीढ़ की हड्डी' बनकर अपने घर-परिवार और स्वास्थ्य की 'आहुति' देता रहा है, लेकिन हमारी सरकारें ऑफिस के चपरासी को पन्द्रह हजार रूपया महीना दे देती है जबकि किसान मात्र तीन हजार रूपये मासिक आय ही ले पाता है अपनी फसलें बेचकर। किसान ओलावृष्टी से बर्बाद फसल पर सरकार से मदद मांगता है तब संसद में मंत्री नीतिन गडकरी भगवान पर भरोसा रखने की सलाह देते हैं और केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को सातवां वेतन आयोग देते वक्त देश की आर्थिक स्थिती सुधरने तक कर्मचारियों को भगवान पर भरोसा रखने की सलाह देने का साहस किसी मंत्री या प्रधानमंत्री में नहीं हैं।
देश का भाग्य विधाता किसान को जयपुर नगर निगम के सफाई कर्मचारी से भी कम आय पर गाँवों में लू के थपेड़ों और भट्टी सी सुलगती जमीन पर भरी दोपहरी में नरेगा में काम करने पर सभी 'कमीशन' काटने के बाद एक सौ रूपये हाथ में आते हैं और वह भी पूरे तीस दिन नहीं।
किसान की फसल आने के बाद मंडियों में सरकार न्यूनतम दर 1450 रूपये तय तो कर लेती है, लेकिन इस सरकारी दर पर उद्योगपति और मंडी का व्यापारी भी किसान से खरीद नहीं करता है और सरकार तो व्यापारियों के ईशारों पर किसान को सरकारी दर से कम पर बेचने को मजबूर कर ही देती है। इन हालात में किसान भगवान के अलावा किस से फरीयाद करे और किसान जब फरीयाद कर करके थक जाता है तो आत्महत्याओं का दौर शुरू हो जाता है।
हमारे देश में प्राकृतिक आपदा बारीश, ओलावृष्टी, बाढ़, अकाल में देश भर से समाजसेवी पीडि़तों की मदद के लिए दवाईयां, कपड़ा, जरूरी सामान लेकर चले जाते हैं। चाहे गुजरात का भूकम्प हो या बद्रीनाथ में बादल फटने की घटना हो, हाल के कश्मीर में भारी बारीश से बर्बादी। सभी में देश भर से ट्रकें भरकर नेताओं से, समाजसेवीयों से हरी झण्डी दिखाकर आपदा वाले क्षेत्रों में राहत भेजी जाती रही है, लेकिन आश्चर्य और दु:ख इस बात का है कि देश में कपास उगाने वाले क्षेत्रों में किसानों ने फसलों की बर्बादी पर 70 प्रतिशत से अधिक आत्महत्याएं की हैं और देश के किसी भी टेक्सटाइल मिल मालिकों या बड़े टेक्सटाइल घरानों में से किसी भी उद्योगपति ने कपास पैदा करने वाले किसानों की मदद के लिए आगे आकर राहत देने का प्रयास नहीं किया जिससे हमारे किसान देश के लिए शर्मनाक मौत से बच सकते थे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक महका राजस्थान के प्रधान सम्पादक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Tuesday, April 21, 2015

दुनिया में कौमी एकता की मिसाल: ख़्वाजा का उर्स


अब्दुल सत्तार सिलावट
ख़्वाजा ग़रीब नवाज़। सरकार-ए-हिन्द। ग़रीब की फ़रियाद सुनने वालों का आस्ताना हमारे राजस्थान में। पाकिस्तान, बांग्लादेश ही नहीं, श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार), नेपाल और खाड़ी देशों में बसे अफगानिस्तान एवं अखण्ड भारत के सिर्फ मुसलमान ही नहीं, मुसलमानों से अधिक ख़्वाजा के दिवाने हैं गैर मुस्लिम। कौमी एकता में यकीन रखने वाले। सूफियाना इबादत को मानने वाले, सभी के क़दम हर साल उर्स मुबारक के मौके पर ख़्वाजा की चौखट अजमेर शरीफ़ की ओर बढऩे लगते हैं और वैसे तो साल भर हर इस्लामी महीने की छ: तारीख़ को ख़्वाजा के दरबार में छठी शरीफ़ की फ़ातिहा भी छोटा उर्स कहलाने लगी है।
सरकार-ए-हिन्द ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के उर्स मुबारक के झंडे की रश्म के साथ ही देश भर से पैदल आने वालों को अचानक दो दिन से तेज़ हुई गर्मी-लू के थपैड़ों और आग उगल रही डामर की सड़कों पर अपनी मन्नतों के लिए नंगे पाँव स$फर तय करते हुए भी देखा जा सकता है।
ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के दरबार में कोई छोटा-बड़ा, अमीर, दौलतमंद, सियासतदां या वज़ीर-ए-वक़्त नहीं होता। यहाँ हाथों में फूल, सर पर चादर लिये सभी अपनी मुरादों की झोलीयां फैलाये ख़्वाजा के आस्ताने की तरफ बढ़ते नज़र आते हैं और ख़्वाजा के दर पर आने वाले करोड़पति से लेकर झौपड़पट्टी के ग़रीब तक सभी मुरादें माँगते हुए ही आते हैं इसलिए ख़्वाजा को ग़रीब को नवाज़ने वाला 'ग़रीब नवाज़' कहा जाता है।
सरहदों पर चाहे गोलियां चलें या जासूसी के ड्रोन पकड़े जाये, लेकिन ख़्वाजा के दिवानों को उर्स मुबारक में आने के लिए हुकुमत-ए-हिन्द कौमी एकता का संदेश देते हुए वीजा भी ज़ारी करती है और ग़रीब नवाज़ के दिवानों का बिना किसी कड़वाहट के मेहमान नवाज़ी के लिए खुले दिल से इस्तक़बाल भी करती है।
अजमेर शरीफ़ की तरफ आने वाले देश भर के 'हाइवे', रेल की पटरियां और हवाई सेवा के साथ छोटी गाडिय़ों में आने वाले ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के दिवानों का राजस्थान की सरज़मीं पर छोटे गाँव, कस्बों और शहरों में खान-पान, वाहन मरम्मत और पैदल ज़ायरीनों का गैर मुस्लिम भाई भी ख़ूब अच्छा इस्तक़बाल करते हुए राजस्थान की मेहमान नवाज़ी की परम्परा 'पधारो म्हारे देस' के नारे को 'पधारो म्हारा ग़रीब नवाज़ री नगरी' के रूप में चरितार्थ करते हैं।
ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ का आस्ताना जितना मुसलमानों की अक़ीदत का दरबार है उससे कई गुना ज़्यादा गैर मुस्लिम भी ख़्वाजा की चौखट पर अपनी मुरादों की दस्तक देते हैं। देश के राजनेता हों या बड़े उद्योगपति और फिल्म नगरी के सितारे हों या खेल जगत की हस्तियां। सभी ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के आस्ताने पर अपनी क़ामयाबी की मुराद लेकर आते हैं और झोलीयां भरने के बाद 'शुकराने' की हाजिरी भी देते हैं।

मोदी से पहले ओबामा ने पेश की चादर...
ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ का उर्स शुरू होते ही देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यों के राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री अपनी ओर से 'चादर' पेश कर मुल्क में अमन, तरक्की, ख़ुशहाली की मुराद मांगते हैं और इस बार भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से 'चादर' पेश की गई तथा विदेश से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की ओर से ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के आस्ताने पर अक़ीदत के साथ चादर पेश की गई। राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कल्याण सिंह की ओर से भी ख़्वाजा के दरबार में चादर पेश की गई।
जब राजनेताओं और अमेरिका से ग़रीब नवाज़ के आस्ताने पर 'चादर' पेश हो चुकी है तब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से अब तक 'चादर' नहीं आने पर चर्चाओं का बाज़ार गर्म हैं। राजनीति के पंडित बता रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी की गुजरात टीम के चाणक्य मोदी के नाम से ख़्वाजा के दरबार में चढ़ायी जाने वाली 'चादर' के गुण-लाभ देख रहे हैं। बताया जा रहा है कि मुसलमानों की टोपी-रूमाल से दूर रहने वाले नरेन्द्र मोदी द्वारा ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के आस्ताने पर 'चादर' चढ़ाने से हिन्दू कट्टरपंथियों की नाराज़गी हो सकती है या साक्षी महाराज की टीम के भगवा राजनेताओं में भी ग़लत संदेश जा सकता है। नरेन्द्र मोदी की टीम ख़्वाजा की चौखट पर 'चादर' चढ़ाने को लेकर 'पशो-पेश' (असमंजस) में हैं फिर भी प्रधानमंत्री पद की परम्परा के अनुसार ग़रीब नवाज़ के आस्ताने पर 'चादर' पेश करने से पहले कट्टरपंथियों को विश्वास में लेने के प्रयास चल रहे हैं जिससे 'चादर' की ख़बर के साथ ही 'उल्टे-सुल्टे' बयानबाजी से बचा जा सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक महका राजस्थान के प्रधान सम्पादक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Thursday, April 16, 2015

अक्षय तृतीया का मतलब बाल विवाह...


अब्दुल सत्तार सिलावट
शारदा एक्ट। अक्षय तृतीया। एक पखवाड़े तक ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात सरकारी अधिकारी पटवारी, तहसीलदार, गाँव की पुलिस चौकी का दारोगा, सभी बाल विवाह रोकने के लिए मुस्तैद। घोड़ी, बैंड, टेन्ट, हलवाई और कार्ड छापने वाले अपना मेहनताना तय करने से पहले दुल्हा-दुल्हन की उम्र की जाँच करते हैं, पास-पड़ौसीयों से। शादी के घर में दुल्हा-दुल्हन के मेहन्दी, पीटी और तेल की रशम से अधिक चिन्ता बालिग होने के प्रमाण पत्र फूल माला की जगह उनके गले में लटकाये रखो और रिश्तेदारों के यहाँ से 'बान' और बन्दोली खाने से अधिक सुबह से शाम तक जाँच करने को आने वाले गाँव के कलेक्टर पटवारी और उनके साथियों को चाय-पानी, अमल की मनुहार में घर का एक बड़ा आदमी लगा रहता है।
अक्षय तृतीया पर नाराज़ रिश्तेदारों, पड़ौसीयों, गाँव में आपकी प्रतिभा से जलने वाले और खेत की ज़मीन पर पड़ौसी से झगड़े का बदला लेने का ऐसा मौका होता है जिसे सभी 'भुनाने' में लग जाते हैं। ऐसे लोग सरकारी अधिकारियों को चोरी-छुपे फोन पर या पोस्टकार्ड लिखकर अपने प्रतिद्वन्दी का ठीकाना बता देते हैं। इसके बाद सरकारी अफसरों, गाडिय़ों और पुलिस के चक्कर लगने से शादी के घर में दुल्हा-दुल्हन के 'लाड़-कोड़' करना भुल कर गाँव के सरपंच, चौपाल के फालतू नेताओं के बीच शादी वाले घर का मुखिया अपने समर्थन में चार लोग जुटाने में ही व्यस्त हो जाता है।
हमारे पूर्वजों ने अक्षय तृतीय (आखा तीज) को 'अणबुझिया मुहुर्त' (बिना पंडित जी को दिखाये शादी का मुहुर्त) और शुभ दिन क्यों बताया इसके पीछे गाँव की गरीबी, निरन्तर अकाल, सूखा से किसान की आर्थिक स्थिती कमजोर होना और यही हालात आज भी है किसान अकाल और सूखे से बचाकर अपनी लहलहाती फसलों को देख बेटी की शादी के सपने बुन रहा था और प्राकृतिक आपदा ने पश्चिमी विक्षोभ के नाम से पकी-पकाई फसलों पर ओलावृष्टी, भारी बारिश ने तबाही कर दी और यह तबाही किसान के घर एक बार नहीं बल्कि निरन्तर एक माह से चल रही है।
गाँवों में सामूहिक परिवार होते हैं। एक बाप के चार बेटे। चारों बेटों के तीन-तीन, चार-चार बेटा बेटी। इन बच्चों में से चार छ: हम उम्र शादी के लायक बालिग हो जाते हैं और परिवार के मुखिया को शादी खर्च की चिन्ताएं घेर लेती है तथा वह अपनी फसल की अच्छी पैदावार की उम्मीद में दो-तीन साल तक शादी को आगे खींच लेता है। गाँवों की परम्परा में बड़ा परिवार, बड़ी रिश्तेदारियां और घर की प्रतिष्ठा के अनुसार शादी में बड़ा खर्च सामूहिक भोज में ही होता है और इसके लिए घर के बड़े-बुजुर्ग की मौत के बाद उनके 'फूल' (अस्थियां) बड़े आयोजन तक हरिद्वार नहीं ले जाकर घर में ही रखते हैं। जब बच्चों की शादी की तैयारी हो जाती है तब घर में रखी अस्थियां हरिद्वार ले जाकर गंगाजी में विसर्जित कर वहाँ से गंगाजल लेकर आते हैं और गाँव के प्रवेश द्वार से घर तक गंगा जल को सर पर उठाकर घर की औरतें ढ़ोल बाजों के साथ घर लाती हैं और अब गंगा प्रसादी के रूप में सामूहिक भोज की तैयारी होती है।
गंगा प्रसादी के सामूहिक भोज में पिताजी की मौत का 'मौसर', बच्चों की शादीयां और नये पैदा हुए बच्चों की ढूंढ़ का खाना भी शामिल हो जाता है। गाँव के बड़े घरों में दस-बीस साल में एक ही बड़ा खाना होता है जिसमें उस जाति का पूरा समाज (न्यात) गाँव के करीबी लगभग सभी शामिल हो जाते हैं। 
ऐसे आयोजन में बाल विवाह का सत्य भी जान लीजिए। बड़े परिवार के तीन-चार भाईयों के बालिग बच्चों के साथ उनसे छोटे बारह साल, दस साल या आठ साल और कई बार दो-तीन साल के बच्चों को भी थाली में बैठाकर अग्नि फेरे पहले करवाते थे जो अब लगभग स्वत: ही बंद कर दिये गये हैं। नाबालिग बच्चों की शादीयां करने के पीछे गाँवों के गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों को बार-बार विवाह के खर्च से बचाने की परम्परा है जबकि बालिग भाई-बहनों के साथ होने वाली नाबालिग या बाल विवाह में शादी की मात्र रशम अदायगी है। यह बच्चे जब जब बालिग होते हैं तब तब इनके गौने (मुकलावा) होते हैं और फिर सुहागरात की दहलीज तक पहुंचते हैं इसलिए इस बाल विवाह को 'मंगनी' या सगाई की रशम जितना ही माना जाता है।
शारदा एक्ट में बाल विवाह के बाद शारीरिक सम्बन्धों (सुहागरात) को बच्चों का शोषण मानकर अपराध बनाया गया था, लेकिन मौजूदा हालात में गाँव के लोग गरीबी की मार के कारण बालिग बच्चों के शादी खर्च में छोटे बच्चों की शादी की रशम अदायगी करते हैं जबकि इनके बालिग होने पर ही सुहागरात तक यह शादीयां पहुँचती है। पढ़ी लिखी एनजीओ से जुड़ी महिला हो या गाँव की अनपढ़-गंवार कही जाने वाली रूढ़ीवादी गृहिणी। इतना सभी जानते हैं कि लड़की जब तक बालिग या परिपक्व नहीं हो जाती उसको गौना या सुहागरात तक कैसे पहुँचा सकते हैं। हमारे देश में रेड लाईट एरियों में 'धंधा' करवाने वाली चकला मालकिनें खरीद कर लाई लड़कियां जब तक बालिग नहीं हो जाती हैं उनकी 'नथ उतरवाने' का सौदा भी नहीं करती हैं फिर गाँव की एक माँ जिसने अपनी कोख से जिस बेटी को पैदा किया है उसे बिना बालिग हुए शारीरिक शोषण के लिए ससुराल कैसे भेज सकती है।
शारदा एक्ट का हम सभी सम्मान करते हैं, लेकिन साल के 365 दिन की शादियों में बाल विवाह की चिन्ता से मुक्त हमारी सरकारें, गैर सरकारी संगठन, जनप्रतिनिधि और जागरूक एवं बुद्धिजीवी गाँवों की गरीबी में हो रहे छोटे भाई बहनों की शादी की रशम अदायगी को बाल विवाह या शारदा एक्ट के उल्लंघन के रूप में नहीं देखकर सरकार की सामूहिक विवाह प्रोत्साहन योजना में शामिल कर गाँव के गरीब के बच्चों की सामूहिक शादी में आर्थिक सहयोग की नीति बनाकर प्रोत्साहित करना चाहिये।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक महका राजस्थान के प्रधान सम्पादक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)