Monday, March 30, 2015

गहलोत साहब, भाजपा को आप साम्प्रदायिक नहीं कह सकते...



ए.एस. सिलावट                                                                         
अब गहलोत साहब को कौन समझाये कि आपको तो कम से कम साम्प्रदायिकता जैसे शब्द पर नहीं बोलना चाहिये क्योंकि आपके पाँच साल के मुख्यमंत्री काल में गोपालगढ़ की मस्जिद में नमाज़ पढ़ते मुसलमानों को पुलिस ने गोलियों से भून डाला, सराड़ा (उदयपुर) में मुसलमानों को रात में नींद से उठाकर बसों में भरकर उदयपुर के मदरसों में भेजकर पीछे से उनकी पूरी बस्ती को पुलिस की मौजूदगी में आग के हवाले कर दिया गया था। ऐसे कई साम्प्रदायिक दंगों के उदाहरण हैं गुलाबपुरा, भीलवाड़ा, कृष्णगंज आदि और पूरे राज्य में पाँच साल तक मुसलमान स्वयं को असुरक्षित एवं ठगा-सा महसूस करता रहा। इन सबसे बढ़कर अशोक गहलोत साहब के गृह जिले जोधपुर के गांव बालेसर में मुसलमानों की ईदगाह को ट्रेक्टरों और बुलडोजर से तोड़ा गया। मुसलमानों के मकानों में रसोई गैस की टंकियों में आग लगाकर तबाह किया गया और यह सब काम भाजपा-शिवसेना या बजरंग दल ने नहीं बल्कि गहलोत साहब की जाति के माली समाज के कांग्रेसी लोगों ने ही किया था।
अशोक गहलोत साहब के मुंह से भाजपा साम्प्रदायिक है यह शब्द शोभा नहीं देता क्योंकि वसुन्धरा राजे के पिछले कार्यकाल (2003-2008) में एक भी साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ और अब तक सवा साल में भले ही मुसलमानों को कुछ मिला नहीं है तो कम से कम कुछ छिना भी नहीं है और राजस्थान का मुसलमान वसुन्धरा सरकार में चैन की नींद सोता तो है।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष या वरिष्ठ नेताओं की चिन्ता भाजपा का भविष्य उज्जवल होने तक सीमित नहीं है। कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत साहब के इस बयान को भी सुन लीजिये। गहलोत साहब कहते हैं कि 'भाजपा सरकार को ग्रामीणों के विकास के खनिज सम्पदा के उपयोग और इनसे सम्बन्धित उद्योगों को गांवों में लगाने पर ध्यान देना चाहिये।' अब कोई अशोक जी से पूछे आप जब मुख्यमंत्री थे तब राजस्थान का खनिज भण्डार समुन्द्र में डूबा हुआ था क्या? आपने ग्रामीणों के विकास के लिए राजस्थान के विशाल भण्डार का उपयोग क्यों नहीं किया?
कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत भी चाहते हैं कि भाजपा की सरकार अच्छे काम करें ताकि अगली बार जनता फिर वसुन्धरा जी को जीतवाकर मुख्यमंत्री बना देवें। अशोक गहलोत भाजपा की सरकार स्थाई रहे इसके लिए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी का काम स्वयं कर रहे हैं। गहलोत साहब सिर्फ खनिज सम्पदा तक ही नहीं बोलते हैं बल्कि भाजपा को साम्प्रदायिक साबित करने के लिए सूर्य नमस्कार का विरोध करते हुए कहते हैं कि यही भाजपा का असली चेहरा है। जनता को भ्रमित कर सत्ता तक पहुँच जाते हैं और अब साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं।
भाजपा की सरकार अगली बार विपक्ष की सीटों पर नहीं बैठ जाये। भाजपा  की नीतियों से ग्रामीण जनता नाराज होकर वसुन्धरा जी को अगले चुनाव में हरा देगी। यह सभी चिन्ताएं भाजपा के मंत्री, विधायक या पार्टी के नेता नहीं कर रहे हैं बल्कि राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जब भी बोलने का अवसर मिलता है तब सत्ता पक्ष की ओर लम्बे लम्बे हाथ करके कहते हैं 'ऐसे ही जनता की अनदेखी करते रहे तो अगली बार हमारी सीटों पर विपक्ष में आप होंगे।' कभी कहते हैं कि 'वसुन्धरा सरकार को ब्यूरोके्रट चला रहे हैं इसलिए अगली बार भाजपा विपक्ष की कुर्सीयों पर दिखाई देगी।'
अब कांग्रेसी नेताओं से कोई यह पूछे कि अगली बार भी भाजपा की ही सरकार बननी चाहिये इसलिए आप विधानसभा में उन्हें उल्टे सीधे कामों पर रोकने के बजाय सुझाव देकर भाजपा की जनता में लोकप्रियता बढ़ाने के 'मिशन' में लगे हुए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रद्युमन सिंह विधानसभा में कहते हैं कि 'वसुन्धरा सरकार समय बर्बाद नहीं करे जनता का काम करे, पाँच साल में से सवा साल तो निकल गया बाकी समय भी कल खत्म हो जायेगा और जनता का काम नहीं करोगे तो जनता आपको भी हमारी तरह सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देगी।'

राजस्थान दिवस: फिजुल खर्ची के बयान शुरु...
राजस्थान के 66वें स्थापना दिवस समारोह की सांस्कृतिक झांकियां जनपथ से रवाना होकर दूसरे छोर तक नहीं पहुँचेगी उससे पहले विपक्षी दलों के नेता वसुन्धरा सरकार पर फिजुल खर्ची का आरोप लगाना शुरु कर देंगे। राजस्थान दिवस पर विधानसभा भवन की रंग बिरंगी रोशनी और जनपथ से वन्दे मातरम् की गगनचुम्बी स्वर लहरों के बीच विपक्षी नेता ओलावृष्टी से बर्बाद फसलों और परेशान किसान को याद करते हुए सरकारी खर्च के दुरुपयोग के नाम पर घड़ीयाली आँसू बहाना शुरु कर देंगे।
हमारे विपक्षी पार्टीयों के नेता सरकारी खजाने से हजारों करोड़ की अपनी जमीन और प्रकृति का दिया तोहफा तेल भण्डार सिर्फ 'चवन्नी' मुनाफे पर कंपनियों को सौंप दें और नौ किलोमीटर के मैट्रो सफर के लिए अपने विभागों से कर्ज दिलवाकर उन्हें दिवालिया बना देवें तब फिजूलखर्ची दिखाई नहीं देती है जबकि आज के तनाव भरे जीवन में 100 मिनट तक राजस्थान दिवस के नाम पर जनपथ पर बैठकर राजस्थान की विभिन्न लोक कलाएं एक पथ पर आ जाये, जनता का मनोरंजन हो जाये, उनका मानसिक तनाव कम हो जाये, जनता में नई सोच, नई उमंग भर जाये ऐसे अच्छे अवसर भी विपक्षी नेताओं को फिजूलखर्ची वाले लगते हैं जबकि सच्चाई यह है कि राजस्थान दिवस की आलोचना करने वाले नेताओं के बच्चे, बीवीयां और पूरा परिवार 'वीवीआईपी' ब्लॉक में बैठकर राजस्थान दिवस के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द लेते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, प्रधान सम्पादक- दैनिक महका राजस्थान एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Friday, March 27, 2015

अटलजी नहीं, भारत रत्न स्वयं हुआ सम्मानित...


ए.एस. सिलावट                                                             
संवेदनशील हृदय, वाक चातुर्यता, सीधे सरल और अपने विरोधियों के दिलों में भी अपनेपन का स्थान रखने वाले भारत के एक सर्व व्यापी, सर्व जाति-धर्म एवं राजनैतिक नेताओं के हृदय सम्राट अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित कर सरकार स्वयं को गौरान्वित महसूस कर रही होगी, लेकिन सच्चाई तो यह है कि आज अटलजी नहीं हमारा सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न स्वयं 'सम्मानित' हुआ है और यही कारण है कि अटल जी को सम्मानित करने भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी स्वयं सभी 'प्रोटोकोल' तोड़कर भारत रत्न का सम्मान देने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के घर गये। उनके साथ अपने राजनैतिक जीवन के अविस्मरणीय क्षणों को 'शेयर' किया।
अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ से राजनैतिक जीवन शुरु कर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना और दो लोकसभा सदस्यों से आज के चौंकाने वाले आंकड़े तक पहुँचाने में अपना योगदान ही नहीं अपने जीवन की 'आहूति' दी है। अटल जी किसी राजनैतिक घराने से नहीं आते हैं और ना ही किसी जाति-धर्म के झंडे को लेकर लोकसभा में पहुँचकर प्रधानमंत्री बने, लेकिन फिर भी आपकी प्रतिभा, अटल जी के राजनैतिक संघर्ष, जनसेवा के साथ कौमल हृदय वाले कवि अटल जी का पंडित जवाहरलाल नेहरु भी सम्मान करते थे। दक्षिण के नेता करुणानिधी, फारू$ख अब्दुल्लाह, ममता बनर्जी, जयललिता ऐसे कई नाम है जो जनसंघ या भाजपा की पृष्ठभूमि वाले एक मात्र नेता अटल जी का सम्मान भी करते थे और अपने मन की बात भी करते थे।
अटल बिहारी वाजपेयी नौ बार सांसद बनकर आज़ादी के बाद पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाने का श्रेय ले चुके हैं। 1996 में अटल जी पहली बार प्रधानमंत्री बने, 13 दिन चली इस सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के बाद संसद में दिये गये भाषण को भारत के राजनैतिक इतिहास में आज भी याद किया जाता है। सरकार गिरने के बाद भी संसद में देश के विकास, राजनैतिक मजबूरियां और फिर सरकार बनाने का संकल्प ही जनता के दिलों को छू गया और अगली बार अटल जी पूरी ता$कत के साथ प्रधानमंत्री बनकर देश को नई सोच, नई दिशा दे गये।
अटल के वाकचातुर्यता और शब्दों से मोहित करने के कई उदाहरण हैं, लेकिन 1999 में भारत-पाक रिश्तों को सुधारने के प्रयास में लाहोर बस सेवा शुरु कर जब स्वयं लाहोर पहुँचे तब गवर्नर हाऊस में उनकी कविता 'ज़ंग नहीं होने देंगे, अब ज़ंग नहीं होने देंगे' सुनकर गवर्नर सहित वहाँ के हुकमरान भावुक हो गये और अटल जी को गले लगाने वालों की कतार लग गई।
दक्षिण में हिन्दी विरोधी आन्दोलन के नेता डीएमके के अन्ना दुरई उन दिनों अटल जी के साथ राज्यसभा मेम्बर थे और हिन्दी विरोधी नेता होने के बावजूद उन्होनें कहा था कि हम अटल जी की कविता जैसी हिन्दी का विरोध नहीं करते हैं और अटल जी जैसी हिन्दी बोलते हैं उसका भी विरोध नहीं करते हैं। अटल जी की देश भक्ती, देश को सर्वोच्च मानने और देश की अस्मिता के लिए कोई राजनैतिक विरोध नहीं। इस भावना से सभी विरोधी पार्टीयों के नेता भी अटल जी का सम्मान करते थे।
अटल जी की कश्मीर यात्रा में वहाँ के लोगों ने जब आपसे पूछा कि कश्मीर समस्या का समाधान आप संविधान के दायरे में करेंगे या कोई और हल है आपके पास। इसके जवाब में अटल जी ने कहा कश्मीर समस्या का समाधान 'इंसानियत' के दायरे में करुंगा और कश्मीरी भी अटल जी के दिवाने हो गये। अटल जी ने बातों से आगे बढ़कर देश की सुरक्षा के लिए पोकरण परिक्षण भी किया जिससे दुनिया की बड़ी शक्तियों को हमारी ताकत का संदेश भी गया।
आज मोदी सरकार के विशाल सांसदों के आंकड़ों वाली भारतीय जनता पार्टी की नींव 'सेक्यूलर' बनाकर अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के सभी धर्मांे, जातियों, वर्गों के लिए दरवाजे खोले थे और उसी का परिणाम है आज देश का मुसलमान भी भाजपा में बढ़ चढ़कर राजनैतिक भागीदारी निभा रहा है और साधारण कार्यकर्ता से लेकर देश के सर्वोच्च सदन लोकसभा एवं भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी दिखाई दे रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक महका राजस्थान के प्रधान सम्पादक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Wednesday, March 25, 2015

राजनाथ के संकल्प ने अल्पसंख्यकों को किया भयमुक्त...


ए.एस. सिलावट                                                                      
देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने परमात्मा की कसम खाकर कहा कि देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए मैं कुछ भी करूंगा। अल्पसंख्यकों के मन में पल रही असुरक्षा की भावना को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जाऊँगा और साथ ही राज्य सरकारों को अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए हर सम्भव कदम उठाने के आदेश भी दे डाले।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश भर का अल्पसंख्यकों पर भाजपा की केन्द्रीय सरकार में बैठे सन्तों, सांसदों और वरिष्ठ विद्वान राजनेताओं द्वारा भड़काऊ भाषण दिये जा रहे हैं साथ ही नवी मुम्बई, नई दिल्ली, मध्यप्रदेश में चर्चों पर हमले हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल में 71 साल की बुजुर्ग नन के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया है। ऐसे समय में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सिर्फ राजनैतिक औपचारिकता पूरी नहीं की है बल्कि बिगड़ते माहौल को लगाम देने के लिए सच्चे मन से और राजधर्म को निभाते हुए एक ओर देश भर के अल्पसंख्यकों को भाजपा की सरकार से अब तक फैली असुरक्षा की भावना को रोका है वहीं दूसरी ओर राज्य सरकारों, केन्द्र की सुरक्षा एजेन्सीयों और धर्म के नाम पर नफरत फैला रहे लोगों को भी स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब गृह विभाग देश की कानून व्यवस्था बिगाडऩे वालों को बर्दाश्त नहीं करेगा।
गृहमंत्री चाहे भाजपा या आरएसएस से राजनीति में आते हों लेकिन इनकी धर्म निरपेक्षता को सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरा देश जानता है कि राजनाथ सिंह ने अगर ईश्वर की शपथ खाकर देश में अल्पसंख्यकों की रक्षा का वायदा किया है तो अब ईसाइयों, मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यकों को भड़काऊ बयान देने वालों को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिये और अल्पसंख्यकों के धर्म गुरुओं, विद्वानों एवं नेताओं को भड़काऊ बयानों पर प्रतिक्रिया भी नहीं करनी चाहिये।
देश की राजधानी में अल्पसंख्यकों के मंच से जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दस माह से अस्थिर साम्प्रदायिक सौहार्द पर खुलकर सच्चे मन से बोल दिया है ऐसे समय में थोड़ा और आगे बढ़कर केन्द्र और राज्यों की सुरक्षा एजेन्सीयों को स्पष्ट आदेश भी देना चाहिये कि बेलगाम, भड़काऊ और अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर भरे बाण छोडऩे वाले बयानबाजी करने वालों को तत्काल कानून की हथकड़ी पहनानी चाहिये। कौमी एकता बिगाडऩे की बयानबाजी करने वालों को सिर्फ मुल्जिम की नजर से देखा जाये भले ही देश की सत्ता पार्टी के नेता हों, सांसद या विधायक हों, भगवा या हरी पगडी वाले हों। कानून ऐसे लोगों को सिर्फ अपराधी की नजर से देखकर कार्यवाही करेगा तभी देश में शांति व्यवस्था कायम रह पायेगी। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने का जो भरोसा दिया है इसे लागू करने में गृह विभाग की सुरक्षा एजेन्सीयां ही मददगार बन सकती है जबकि देश के अल्पसंख्यकों का सुरक्षा एजेन्सीयों से विश्वास उठ चुका है इसके परिणामस्वरुप गुजरात, मुजफ्फरपुर, आसाम, के दंगों में मूल दंगाइयों को भूलकर अल्पसंख्यक पुलिस, आरएसी से भीड़ जाते हैं और अल्पसंख्यकों ने ऐसा मान लिया है कि देश की पुलिस और सुरक्षा एजेन्सीयां अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो चुकी है। गृहमंत्री जी, सुरक्षा एजेन्सीयों के खिलाफ फैले इस भ्रम को तोडऩे के लिए आपको अपने गृह विभाग में भी सोच बदलने का एक अभियान चालाना होगा तभी आपका अल्पसंख्यक सुरक्षा का संकल्प पूरा हो पायेगा।
देश की कौमी एकता को बिगाडऩे का मिशन चलाने वालों के निशाने पर अल्पसंख्यकों में मूलत: ईसाई और मुसलमान हैं। इनमें से ईसाई देश में धर्म परिवर्तन के आरोप लगे हैं, जबकि मुसलमानों को आतंकवाद शब्द से जोड़कर देश की मुख्य धारा से अलग थलग करने के प्रयासों में बहुत सफलता भी मिली है।
देश की ईसाई मिशनरियां विरान जंगलों में बैठे आदिवासियों की सेवा और शहरों में मिशनरी स्कूलों के माध्यम से शिक्षण क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। इनकी आय क्या है? गरीबों की सेवा के लिए पैसा कहाँ से आता है? और जिनकी भी सेवा करते हुए वे गरीब सेवा करने वालों को 'दुवाएं' देने के बदले उनके धर्म में ही शामिल हो जाते हैं। अब तक ऐसे ही आरोप ईसाई अल्पसंख्यकों पर लगते रहे हैं। लेकिन भारत का मुसलमान आपके गली-मौहल्ले में पंचर निकालता है। चाय की दूकान चलाता है। मजदूरी करता है। सब्जी बेचता है। आपकी कार का ड्राइवर, आपकी फैक्ट्री का चौकीदार। मुसलमान के बच्चे कानवेन्ट, सैंट जेवियर या दून स्कूल में नहीं आपकी मौहल्ले की सरकारी स्कूल में बिना ड्रेस के दण्ड स्वरुप हमेशा प्रार्थना सभा की लाईन से दूर एक कौने में खड़ा रहकर मुश्किल से आठवीं तक पहुँचकर अपने बड़े भाई या पिता के साथ काम पर चला जाता है और परिवार में एक और कमाने वाला तथा भारत देश में एक और गरीब मजदूर बनकर अल्पसंख्यकों के आँकड़ों में वृद्धी कर देता है।
देश के मुस्लिम नौनिहाल जो घर के आसपास की मस्जिद के कमरे में जहाँ टूटी चटाई, दिवारों मकडियों के जाले और टूटी खिड़कियों से आ रही रोशनी में बैठकर अलीफ, बे, ते, से पढ़ता है। इन्हीं मदरसों से नमाज, रोजा, जकात अपनों से गरीब पर दया करना सिखता है। इन्हीं मदरसों को देश के अल्पसंख्यक विरोधी नेता आतंकवाद का अड्डा कहते हैं।
गृहमंत्री जी, भारत का सौ करोड़ हिन्दू अल्पसंख्यकों का विरोधी नहीं है। मात्र एक या दो प्रतिशत लोग मनगढ़त भड़काऊ भाषण, अल्पसंख्यकों पर बेहुदी टिप्पणियां करके देश के सौ करोड़ हिन्दूओं के दिलों में नफरत का बीज बोकर दंगों की फसल काटना चाहते हैं। देश के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने के लिए मानसिक विकृति के शिकार एक दो प्रतिशत लोगों पर सख्ती के साथ लगाम लगानी होगी। अगर आपका गृह विभाग भड़काऊ जबान वाले लोगों को मीडिया की पहुंच से दूर रखने में कामयाब हो जायें तो भारत में आने वाले सौ साल तक भले ही देश की बागडोर भाजपा-आरएसएस या अन्य हिन्दूवादी संगठनों के हाथ में रहे हमारी कौमी एकता को कोई भी तोड़ नहीं सकता है। गंगा-जमुनी तहजीब, हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा आज भी देश के कौने-कौने में मौजूद है, इसलिए हर दंगे की टीवी स्क्रीन से कवरेज हटने के बाद हम वापस भाईचारे का धर्म निभाने लग जाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, प्रधान सम्पादक-दैनिक महका राजस्थान एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)